हर रात अंधेरी अब मुझे तड़पाती है.
उसकी परछाई तो अब मुझे अंधेरे में भी नज़र अति है
यु रात की ख़ामोशी में भी जैसे उसकी आवाज सी आती है
मुझे बुला रहा है कोई एसी आभास से आती है
हर रात अंधेरी अब मुझे तड़पाती है....
जानता हु मैं मेरे आस पास अब कुछ नई..
महज एक सनाटा है...
उसकी आवाज नहीं ये दिल का मेरे एक दिलाशा है
जानता हु मैं मेरे आस पास अब कुछ नई..
महज एक सनाटा है........
महज इतने अंधेरे में भी हर घर में तिनका सा तो एक उजाला है
और मेरे आँगन में देखो अब तो दिन में भी रात का ही ठिकाना है.
अब तो मुझे इसी अंधेरे तले ज़िन्दगी बतानी है
पत्तो की सर सराहत को ही उसकी आवाज बनानी है
अब हर रात अंधेरी मुझे यु ही ज़िन्दगी बितानी है....
अब तो मेरे घर की हर दिवार भी खामोश हो गई है
बिस्तरों पर जो सिलवटे पड़ती थी
वो भी ना जाने कहा खो गई है
उसकी आवाज जो मेरे कानो में गूंजती थी
वो भी आब खामोश सी हो गई है
हँसी जो मेरे चहरे पर थी
वो भी सायद कही तेरे साथ ही खो गई है.....
अब तो मेरे घर की हर दिवार भी खामोश हो गई है
बिस्तरों पर जो सिलवटे पड़ती थी
वो भी ना जाने कहा खो गई है..................
