Wednesday, April 27, 2011

काश वो अपना बीता बचपन ले आउ

काश मेरा वो बचपन लॉट आए..
समुंदर के साहिल पर रेत का फिर महल बनाए ..
काश मेरा वो बचपन लॉट आए....
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               काश अपने घरौंदे के झूले में फिर से झूलता रहू
              काश मा की लोरियो से रात को सोता राहू
              काश खाब में हर रोज एक नए सपने संजोता रहू 
             काश वो अपना बीता बचपन ले आउ


काश फिर कंधो पर किताबो के बोझ ले
पापा की उंगलिया पक़ड़ कर स्कूल जाउ 
काश अपनी हरकतो से फिर से घर में हलचल मचाउ
फिर मा की डाट से गुम सूम कीसी कोने में छुप जाउ
काश अपना वो  बीता बचपन ले आउ................

Tuesday, April 19, 2011

है तेरे दर्द का एहसास मुझे भी

ना कर मुझे इतना  बेबस और लाचार
है तेरे दर्द का एहसास मुझे भी
कट रही होगी ज़िंदगी कैसी        
है इस बात का  अंदाज़ मुझे भी
   
      ना शिकायत कर सकता खुदा से
     ना दे सकता बेवफा नाम तुझे                       
      ये ज़िंदगी किस मोड़ पर ला खड़ी कर गई
        ना पा सकता तुझे ना खो सकता कभी



ना गम है मुझे मेरे गम का
मैं तेरा गम सोच डर जाउ
मैं तो जी लु भरी आंसू मे
पर तेरे आंसू देख मर जाउ

     ना कर मुझे इतना  बेबस और लाचार
     है तेरे दर्द का एहसास मुझे भी....................








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Wednesday, April 6, 2011

वो किसी और की

कल रात मैने एक सवपन देखा.
सवपन क़ाबिले गोर था.
उसके हॅंतो में थी मेहन्दी लगी.
मेरे भी सेर मौर् था.
मंडप था पूरा सॅजा हुआ सब कुछ वाहा बतोर था.       
सुबहा तलक जब आँखें खोली नज़ारा ही कुछ और था.
मेरा प्यार था जो उसका प्यार कोई और था.
दिल पया किसी और ने था , दिल खोया कोई और था.
वो प्याली थी किसी और की.............
पीने वाला कोई और था..
कल रात मैने एक सवपन देखा
सवपन क़ाबिले गोर था..................

कुछ रिश्ते भी अजीब होते है

कुछ रिश्ते भी अजीब होते है
ना चाह कर भी हम एक डोर में उलझे होते है
जी करता है कभी आज़ाद पंछी की तरह तोड दु  इस डोर को
एक झुकते डाली से उठ कर बैठ जाउ किसी और को
क्यू उलझन में रह जाती है ज़िंदगी  इतनी
ना उड़ सका उस डाली से
 ना सुलझा पाया उस डोर को
क्यूँ कुछ रिश्ते भी अजीब होते है


           यू कट जाती है ज़िंदगी एक बेवश  पंछी की तरह पिंजरे में
           एस बंद पिंजरे से मिल जाए उसे खुशी यह सिलसिला है मेरे जीने में
           यू एक बूँद पानी से मिटा कर अपनी प्यास
            फिर रम जाता हूँ इसी सिलसिले में
           यू कट जाती है ज़िंदगी एक बेवश  पंछी की तरह पिंजरे में