Wednesday, April 6, 2011

कुछ रिश्ते भी अजीब होते है

कुछ रिश्ते भी अजीब होते है
ना चाह कर भी हम एक डोर में उलझे होते है
जी करता है कभी आज़ाद पंछी की तरह तोड दु  इस डोर को
एक झुकते डाली से उठ कर बैठ जाउ किसी और को
क्यू उलझन में रह जाती है ज़िंदगी  इतनी
ना उड़ सका उस डाली से
 ना सुलझा पाया उस डोर को
क्यूँ कुछ रिश्ते भी अजीब होते है


           यू कट जाती है ज़िंदगी एक बेवश  पंछी की तरह पिंजरे में
           एस बंद पिंजरे से मिल जाए उसे खुशी यह सिलसिला है मेरे जीने में
           यू एक बूँद पानी से मिटा कर अपनी प्यास
            फिर रम जाता हूँ इसी सिलसिले में
           यू कट जाती है ज़िंदगी एक बेवश  पंछी की तरह पिंजरे में


 

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